एक किस्सा
चलो एक किस्सा सुनते हे, कुछ जुठ को सच करते है. बात हर वो इश्क़ की, जो इश्क़ पे चरते है, चलो एक किस्सा सुनते है, कुछ जुठ को सच करते है. इश्क़ की गहराई में थे, दुनियाकी जिक्र न थी...(2) जिक्र और फिक्र थी तो बस एक दूसरे की थी. गुमते रहते थे हाथो में हाथ लिए बेफिक्र...(2) बेफिक्र वो थे, पर देख उन दोनो को फिक्र जमानेको थी. गुस्सा रहता था नाक पे...(2) कभी खुद, तो कभी उसने संभाला, वैसे ही उन्होंने वो रिस्ते को पाला. बोल दिया गुस्से में कभी कबार जो नही बोलना था...(2) फिर जाके पछताया, दुख हुआ, खुदको सज़ा पाया. बदल रहा था खुदको, उसके काबिल बनने को...(2) कभी आयने में देख खुद को पूछता कोन था वो. तकलीफ थी ज़िन्दगीमें, टूट जाता था वो...(2) तब जाके गले लगा के संभाल लेती थी वो. बीमार होता था, तो तड़पती थी वो...(2) दवाई कही और से लाता, और पूछता था कोनसी लू ये ओर वो. अभी तो था उजाला, पर डरता था वो...(2) कही फिर वो अंधेरा ना हो जाये, जहा नहीं थी वो. हर वो आश जो पूरी की उसने...(2) शुक्र गुज़र था के ऐसे समझने वाली मिली थी वो. बहोत से सपने देखे, कुछ ख्वाहिशो के ...