एक किस्सा


चलो एक किस्सा सुनते हे, कुछ जुठ को सच करते है.
बात हर वो इश्क़ की, जो इश्क़ पे चरते है,
चलो एक किस्सा सुनते है, कुछ जुठ को सच करते है.

इश्क़ की गहराई में थे, दुनियाकी जिक्र न थी...(2)
जिक्र और फिक्र थी तो बस एक दूसरे की थी.

गुमते रहते थे हाथो में हाथ लिए बेफिक्र...(2)
बेफिक्र वो थे, पर देख उन दोनो को फिक्र जमानेको थी.

गुस्सा रहता था नाक पे...(2)
कभी खुद, तो कभी उसने संभाला,
वैसे ही उन्होंने वो रिस्ते को पाला.

बोल दिया गुस्से में कभी कबार जो नही बोलना था...(2)
फिर जाके पछताया, दुख हुआ, खुदको सज़ा पाया.

बदल रहा था खुदको, उसके काबिल बनने को...(2)
कभी आयने में देख खुद को पूछता कोन था वो.

तकलीफ थी ज़िन्दगीमें, टूट जाता था वो...(2)
तब जाके गले लगा के संभाल लेती थी वो.

बीमार होता था, तो तड़पती थी वो...(2)
दवाई कही और से लाता, और पूछता था कोनसी लू ये ओर वो.

अभी तो था उजाला, पर डरता था वो...(2)
कही फिर वो अंधेरा ना हो जाये, जहा नहीं थी वो.

हर वो आश जो पूरी की उसने...(2)
शुक्र गुज़र था के ऐसे समझने वाली मिली थी वो.

बहोत से सपने देखे, कुछ ख्वाहिशो के धागे भी बांधे...(2)
कुछ मुकमल हुए, तो कुछ थे आधे.

लिखता रहता था कभी कभी उसके बारे में...(2)
पढ़ के बोलती थी, मुजे नही जाना तेरे प्यारमें किनारे.

चल रही थी इश्क़ की गाड़ी...(2)
न था कोई स्टेशन, और नही थी कोई और सवारी.

वक़्त को पीछे छोड़ के निकले थे आगे...(2)
कुछ साल युही बीत गए, कुछ आने वाले थे आगे.

                           ***

(कुछ साल बीत गए, कुछ आने वाले थे आगे.)
(बात है एक लड़के और लड़की और उनके इश्क़ की.
सब कुछ सही चल रहा था, पर वक़्त ओर उम्रके साथ विचार भी बदले. फिर एक दिन हुआ यू के कुछ राज़ और चहरे आये सामने. रिश्ते तोड़ने को बहाने आये सामने)

कुछ सालों बाद...

फिर आई समझदारी, औकात और पैसा,
कहा तुम और कहा में.

बोली तोड़ के सब वादे, कसमे,
तुम तुम्हारे और हम हमारे रास्ते.

कुछ इसकदर बदले अंदाज उनके,
समझ नही पाया क्या यही थे अपने.

सबकुछ जानता था वो,
समजा बहोत गया, पर परख नही पाया वो.

बेबस कर के वो किसी और से दिल लगाती थी,
पुरानी चीज़ छोड़ नई अपनाने की आदत जो थी.

हर वो बात और बहाना गोर से सुने,
पता लगाया कोन है वो जिसको है चुने.

लड़ता रहा उससे, क्योंकि खोना नही चाहता था,
पर तब नही जब छोड़ने को वो थी बोली.

वैसे छोडने की बात तो तब हुई थी,
पर जानते थे, फैसला लिए उनकी रात हुई थी.

                      ***
                      यकीन.

सही थे हम तब तक उनकी नजर में,
जब तक उनकी नजर में कोई और बसा न था.
पसंद थी हमारी हर वो आदत,
जब तक उनकी आदते बदली न थी.
शिकायते न थी कभी हमसे,
जब तक उनको ज़रूरत पड़ी न थी.
हर वो चीज़ उनके पास, वो हमारे पसंद की थी,
जब तक उनकी पसंद कोई और न था.
ऐसा तूफान उठा समुंदर की लहरों में,
वो तो किनारे चल दिये,
हम वही ख़्वाहिसोमे डूब गए.
दुख इसतरह बीचमें छोड़ के जाने का न था,
पर जाते वक़्त,
उनकी आंखोमें एक आंसू न था.
उनको लगता है बहोत चालाक थे वो,
सच बताऊ,
उनकी खुशीमें हमे मंजूर था वो.

                         यादे

(बहोत वक़्त हो गया उसको देख हुए, उसको सुने हुए, आज भी उससे की हुई वो बाते याद आती है, पुरानी चेट पढ़ कर मुस्कान आती है, कुछ फोटो आज तक सम्भालके रखे है जिसको देख कर उसके साथ बिताए हुए हर पल को महसूश करता हु, मिला करते थे  जिस जगह पे हम अक्शर उसी जगह पे बैठ के वोही यादो को बुनता हु, आज भी तेरा दिया हुआ वो कम्बल लेके सोता हु उसी कम्बल में तेरी यादों के साथ खुद को समेटता हु.)


जान जाती थी जिसके जाने से, उसको भी जाते हुए देखा है.
बिना पूछे खुलने वाले दरवाजे को बंध होते हुए देखा है,
एक पल नही रह पाते थे बात किए बिना,
आज खुद को उनसे बात करने तड़पते हुए देखा है.
मिला करते थे जी भरके उनको,
वही आज उनको देखने ऑंखोंको तरसते देखा है.

✍️अक्ष.


Comments

Popular posts from this blog

જરૂરી તો નથી.

वो में हूं

તારું વર્ણન